आठ बैंकों से 637 करोड़ की धोखाधड़ी: फर्जी कंपनियां, डमी निदेशक और दलालों की मिलीभगत से खुला बड़ा घोटाला

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प्रवर्तन निदेशालय (ईडी), चेन्नई आंचलिक कार्यालय ने धन शोधन निवारण अधिनियम ‘पीएमएलए’, 2002 के तहत मेसर्स अरविंद रेमेडीज लिमिटेड से जुड़े विभिन्न स्थानों पर दो सितंबर को छापेमारी की है। दो दिन तक चले सर्च अभियान में चेन्नई, कांचीपुरम, गोवा, कोलकाता और मुंबई में प्रमोटरों, डमी निदेशकों एवं प्रमुख व्यक्तियों के परिसर शामिल थे। इस मामले में आरोपियों ने 8 बैंकों के साथ 637 करोड़ रुपये की धोखाधड़ी की है। बैंकों से ज्यादा लोन के लिए फर्जी कंपनियां बनाई गई। उनके डमी निदेशक नियुक्त किए गए। खास बात है कि ये सब काम ‘दलालों’ ने किया। डमी निदेशकों को दलालों से हर माह नकद वेतन मिलता था।   ईडी ने सीबीआई द्वारा दर्ज एफआईआर के आधार पर पीएमएलए के तहत उक्त मामले की जांच शुरू की है। यह एफआईआर पंजाब नेशनल बैंक की शिकायत के आधार पर दर्ज की गई थी। इसमें आरोप लगाया गया था कि अरविंद रेमेडीज लिमिटेड, इसके प्रमोटर अरविंद बी शाह और अन्य ने बैंकों के संघ को 637 करोड़ रुपये तक धोखा दिया। बैंकों के संघ में पीएनबी, यूनाइटेड बैंक ऑफ इंडिया, भारतीय स्टेट बैंक, आईडीबीआई बैंक, इलाहाबाद बैंक, करूर वैश्य बैंक, इंडियन ओवरसीज बैंक और कॉर्पोरेशन बैंक जैसे विभिन्न बैंक शामिल रहे। आरोपियों को 704.75 करोड़ रुपये की विभिन्न ऋण सुविधाएं (नकद ऋण, सावधि ऋण और गैर-निधि आधारित) प्रदान की गई थीं।  बैंकों के खातों के अनुसार, 30 सितंबर 2016 तक आरोपियों की तरफ 637.58 करोड़ रुपये बकाया थे। सभी बैंक ऋण खातों को एनपीए घोषित कर दिया गया था। ईडी की जांच से पता चला है कि बैंक के धन को प्रमोटरों द्वारा नियंत्रित फर्जी संस्थाओं के माध्यम से गबन किया गया था। प्रमोटर अरविंद बी. शाह ने दलालों के माध्यम से कई फर्जी निदेशकों को इन फर्जी कंपनियों के प्रबंधन के लिए नियुक्त किया था। बैंकों को अधिक टर्नओवर दिखाने और इस तरह बैंकों को अधिक धन उधार देने के लिए प्रेरित करने के लिए बैंक के धन को फर्जी कंपनियों के बीच घुमाया गया।  धन के इस घुमाव का उपयोग शेयर की कीमतों में कृत्रिम रूप से हेरफेर करने और लाभ कमाने के लिए भी किया गया था। धन का एक निश्चित हिस्सा संपत्तियां हासिल करने के लिए डायवर्ट किया गया था। बैंकों को जमानत के रूप में प्रदान की गई संपत्तियों को बैंकों की जानकारी के बिना ही बेच दिया गया। इस तरह बैंकों को ऋण वसूली के लिए संपत्तियों से वंचित कर दिया गया। सर्च अभियान के दौरान, फर्जी निदेशकों ने स्वीकार किया कि उन्हें कंपनी के कामकाज की जानकारी नहीं थी। उन्हें दलालों द्वारा नकद मासिक वेतन दिया जाता था। ऐसे फर्जी निदेशकों ने नाममात्र के कमीशन के लिए बिना उद्देश्य जाने ही फर्जी कंपनियों के चेक पर हस्ताक्षर कर दिए।  तलाशी अभियान के परिणामस्वरूप प्रमोटरों द्वारा परिवार के सदस्यों/दूर के रिश्तेदारों आदि के नाम पर रखी गई कुछ संपत्तियों ‘अचल संपत्तियां और शेयर’ की पहचान हुई, ताकि बैंकों को ऋण/संपत्ति की वसूली से रोका जा सके। प्रमोटरों द्वारा रखे गए विभिन्न सूचीबद्ध और गैर-सूचीबद्ध कंपनियों के लगभग 15 लाख शेयर फ्रीज कर दिए गए हैं। इन संपत्तियों का मूल्यांकन किया जा रहा है। जांच एजेंसी ने कई आपत्तिजनक डिजिटल और दस्तावेजी साक्ष्य जब्त किए गए हैं। मामले में आगे की जांच जारी है।

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