द्रौपदी की पीड़ा, युद्ध की वजह मैं नहीं,एसआरएमएस रिद्धिमा में हुआ अग्निसुता का मंचन

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बरेली। एसआरएमएस रिद्धिमा में रविवार को नाटक अग्निसुता का मंचन हुआ। एसआरएमएस रिद्धिमा की प्रस्तुति और डॉ. प्रभाकर गुप्ता और अश्वनी कुमार द्वारा लिखित और विनायक कुमार श्रीवास्तव द्वारा निर्देशित इस नाटक अग्निसुता महाभारत के संबंध में आधारित उस भ्रांति को उठाया गया, जिसमें कहा जाता है कि महाभारत द्रोपदी के कारण हुआ। नाटक आरंभ पांडवों के शिविर से होता है। जहां अश्वत्थामा पांडव समझ कर सोते हुए उनके पांच पुत्रों का वध कर देता है। द्रौपदी श्रीकृष्ण के साथ मंच पर प्रवेश करती है और अपने पुत्र का शव देख कर दुखी होकर विलाप करती है। महाभारत का दोषी वो स्वयं को मानती है। अगले दृश्य में द्रुपद का पुत्र धृष्टद्युम्न अग्नि से प्रकट होता है। तभी एक पुत्री के अग्नि से प्रकट होने की आकाशवाणी होती है,

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जिसे सुन कर द्रुपद क्रुद्ध हो जाता है क्योंकि उसको पुत्री नहीं चाहिए, लेकिन विवशता में वो अभिशप्त पुत्री मांगता है। अपनी पुत्री को पूरा जीवन अपमानित और कलंकित होने वरदान मांगता है। द्रुपद की की इसी पुत्री को अग्नि से प्रकट होने के कारण अग्निसुता कहा गया जो बाद द्रौपदी कहलाई। अगले दृश्य में द्रौपदी का स्वयंवर दिखता है, उसमें दुर्योधन, कर्ण, दुःशासन सहित कई युवराज और राजा आते हैं। स्वयंवर में नीचे पानी के बड़े बर्तन में देख कर ऊपर घूमती मछली की आंख को भेदना है। जिसके लिऐ कर्ण उठता है, लेकिन द्रौपदी उसे सूत पुत्र कह कर ऐसा करने से रोकती है। फिर अर्जुन मछली की आंख भेद कर द्रौपदी से विवाह कर लेता है। सभी पांचों भाई वन में कुंती के पास प्रसन्नता के आते हैं और माता से अर्जुन के पराक्रम को बताते हैं, कहते हैं कि अर्जुन ने अपने पराक्रम से कोई वास्तु जीती है। माता कुंती उन्हें आपस में बांट लेने की सलाह देती हैं। सभी असमंजस में पड़ जाते हैं। द्रौपदी क्रोधित होती है, कृष्ण उसे समझाते हैं कि यही नियति है। द्रोपदी के पांच पति होने के कारण उसको पांचाली भी कहा जाता है। अगले दृश्य में अपनी मेहनत और श्रीकृष्ण की कृपा से पांडव इंद्रप्रस्थ बसाते हैं। इसका वैभव देख दुर्योधन इंद्रप्रस्थ को पाने के लिए जुए खेलने के लिए युधिष्ठिर को आमंत्रित करता है। वह अपने मामा शकुनि की सहायता से इंद्रप्रस्थ सहित द्रौपदी को भी जीत लेता है और अपने भाई दु:शासन से द्रोपदी का चीरहरण करवाता है। श्रीकृष्ण की सहायता से द्रौपदी अपनी लाज बचाती है। सभा में द्रौपदी के अपमान पर भीम दुःशासन का वध कर उसकी छाती से निकले लहू से द्रोपदी के केश धोने की प्रतिज्ञा करता है। अगला दृश्य फिर मरणासन्न दुर्योधन दिखता है। अश्वत्थामा उसके पास आता है और उसे सारे पांडवों को मार देने की जानकारी देता है। उधर श्रीकृष्ण पांडव के साथ उसके पास आते हैं और पांडवों के जीवित होने की जानकारी देते हैं वो बताते हैं कि अश्वत्थामा ने पांडवों के छोटे बालकों को मारा है। यह सुनकर अश्वत्थामा और भी प्रसन्न होता है कि उसने पांडवों का वंश समाप्त कर दिया। इस पर श्रीकृष्ण क्रोधित होकर अर्जुन से अश्वत्थामा के मस्तक पर लगे मोती को निकलने को कहते हैं। वह अश्वत्थामा को आजीवन पीड़ा के साथ जीवित रहने का शाप देते हैं। अंत में श्री कृष्ण के साथ द्रौपदी मंच पर आती है। कृष्ण बोलते हैं द्रौपदी तुम्हारे त्याग और कष्ट के सामने मेरे पुण्य कुछ भी नहीं। द्रौपदी कहती है उसने अपने जीवन में हमेशा ही अपने आप को अपमानित पाया, दुःख सहे, राज महल में रहने के बाद भी तिरस्कृत रही।

पांच पांच पतियों की पत्नी कहलाई, मुझे वेश्या भी कहा गया। मुझ पर ही आरोप लगे कि मेरे कारण महाभारत युद्ध हुआ, जबकि मैं तो कारण नहीं थी। युद्ध हुआ कौरवों की महत्वकांक्षा और हठधर्मिता के कारण। फिर भी मुझे महाभारत का कारण क्यों माना जाता है। मैं तो अग्निसुता हूं। नाटक में द्रौपदी का मुख्य किरदार अक्सा खान ने निभाया। अभिनव शर्मा (अश्वत्थामा), आशुतोष अग्निहोत्री (दुर्योधन), गौरव कार्की (अर्जुन), फरदीन हुसैन (श्रीकृष्ण), मानेश (युवराज), जयदेव पटेल (निर्धन), मनोज शर्मा (द्रुपद), जितेन्द्र यादव (धृष्टद्युम्न), मनोज शर्मा (भीष्म), राज किशोर (द्रोणाचार्य), ईशान रस्तोगी (कर्ण), आस्था शुक्ला (कुंती), शिवम यादव (शकुनि), जितेंदर जीत (भीम), अंशुल चौहान (दुःशासन), मानेश यादव (युधिष्ठिर) ने भी अपनी भूमिकाओं में बेहतरीन अभिनय किया। सूत्रधार के रूप में संजय सक्सेना मौजूद रहे जबकिक्षमा शुक्ला ने नाटक में संगीत संयोजन किया। जिसमें वायलिन पर सूर्यकान्त, हारमोनियम पर टुकमनी सेन, तबला पर सुमन विश्वास, सितार पर कुंवर पाल मौजूद रहे। नाटक में एस आर एम एस ट्रस्ट के संस्थापक व चेयरमैन देव मूर्ति , आदित्य मूर्ति आशा मूर्ति , ऋचा मूर्ति , डा. प्रभाकर गुप्ता, डा. अनुज कुमार, डा. रीटा शर्मा मौजूद रहे।

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