ऐतिहासिक मोतीपार्क से अवैध कब्जे हटाकर हराभरा बनाया जाए

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बरेली। बरेली के जिस मोती पार्क में आर्य समाज के संस्थापक स्वामी दयानंद ने चर्च के फादर पी जे स्कॉट से शास्त्रार्थ किया था। जहां 1947 में क्रांतिकारियों ने देश की आजादी के लिए जोश भरी ललकार लगाई थी। देश की आजादी के लिए महात्मा गांधी, जवाहर लाल नेहरू की सभाएं यहां होती थीं। आज बरेली का वह मोती पार्क बदहाल पड़ा है। नगर निगम की ओर से पार्क की इस जगह पर हाइड्रोलिक वाहन स्टैंड चलवाया जा रहा है। इसके कुछ हिस्से पर वाटर पंप, शौचालय के अलावा खानपान की दुकानदारों अवैध कब्जे हैं। बिजली विभाग ने कभी यहां लगी बड़ी मशीनों को हटा कर यहां अपना पुराना कबाड़ हुए तारो का गोदाम बनाया हुआ है। बरेली के इसी मोती पार्क में आजादी के बाद भी यहां बने ईंटो के पक्के चबूतरे पर भी राजनेता जनसभा को संबोधित करते रहे थे। देश प्रथम राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद जब बरेली में 16 मई 1960 में चुन्ना मियां के मंदिर का उद्घाटन को आए थे । तो उनका वाहन भी मोतीपार्क में ही रुका था एसा लोग बताते हैं। बरेली के राजनेताओं ने उनका स्वागत भी यहीं किया था। पूर्व प्रधानमंत्री रहे पंडित जवाहर लाल नेहरू, अटल बिहारी बाजपेई, चौधरी चरण सिंह के अलावा महात्मा गांधी, विजय लक्ष्मी पंडित, पंडित पंत हेमवती नंदन बहुगुणा, विजय राजे सिंधिया, लाल कृष्ण आडवानी की भी यहां जन सभा हो चुकी हैं। तब कुतुबखाना (लाइब्रेरी) की सीढ़ियों पर बैठकर लोग जनसभा में आए नेताओ के भाषण सुनते थे। वर्ष 1868 में अंग्रेजो द्वारा टाउन हाल में बनी लाइब्रेरी 1962 के आसपास जमींदोज हो गई थी। उसकी जगह घंटाघर एवम कुतुबखाना पुलिस चौकी बनी हुई है। बरेली के इस ऐतिहासिक मोतीलाल नेहरू के नाम पर बनी मोतीपार्क के काया कल्प होना तो दूर नगर निगम ने भी इसे उपेक्षित कर यहां शौचालय एवम हाइड्रोलिक वाहन पार्किंग और बना दी। बरेली में कुतुबखाना महादेव पुल के नीचे बने इस पार्क को हरा भरा कर उसका सौंदर्यीकरण होना आज की आवश्यकता है। पर नगर निगम ऐतिहासिक मोतीपार्क पर मोन है ।

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बरेली के इस मोती पार्क में आजादी से पूर्व से ही कई बड़ी सभाएं कई प्रदर्शन हुए थे। यहां नगर पालिका में वर्ष 17 अक्तूबर 1920, 5 मई 1921 को टाउन हाल एवम 13 जून 1929 एवम वर्ष 1934 में भी महात्मा गांधी बरेली आए थे। देश में चल रहे खिलाफत आंदोलन के दौरान महात्मा गांधी मौलाना मोहम्मद अली, शौकत अली और स्वामी सत्यदेव भी आए थे। उनकी सार्वजनिक सभा कंपनी बाग में होनी थी लेकिन ब्रिटिश हुकूमत ने वहां सभा के आयोजन पर प्रतिबंध लगा दिया, जिसके बाद मोती पार्क में महात्मा गांधी की सभा कराई गई थी। इस मोती पार्क में फरवरी 1921 को प्रस्तावित रैली को रोकने के लिए तत्कालीन कलेक्टर ईस्टब्स ने पूरे जिले में 144 लगा दी थी। स्वतंत्रता संग्राम सेनानी स्वर्गीय पी सी आजाद ने अपनी पुस्तक जैसा मैने देखा में इसका उल्लेख भी किया है । 1937 में पंडित जवाहर लाल नेहरू और विजय लक्ष्मी पंडित ने इसी मोती पार्क में सार्वजनिक सभा को संबोधित किया। अंग्रेजों भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान 26 जुलाई 1942 को इसी मोती पार्क में जनसभा को गोविंद बल्लभ पंत ने भी संबोधित किया था, जिसके बाद बरेली में क्रांतिकारियों की धड़-पकड़ तेज हो गई। बरेली के इसी मोती पार्क में आर्य समाज के संस्थापक स्वामी दयानंद तीन बार बरेली आए थे। आर्य समाज के नेता श्वेत केतु शर्मा के अनुसार स्वामी दयानंद जब बरेली में तीसरी बार आए थे तो इसी मोतीपार्क में 25, 26, 27 अगस्त 1879 को स्वामी दयानंद का शास्त्रार्थ चर्च के फादर डॉ पी जे स्कॉट से हुआ था। जिसका विषय था “पुर्नजन्म, ईश्वर अवतार और ईश्वर पापों को क्षमा करते हैं”। इन तीनों विषय पर शास्त्रार्थ में स्वामी दयानंद ने फादर डॉ स्कॉट को निशब्द कर दिया था। तब फादर स्कॉट ने कैंट स्थित चर्च में व्याख्यान के लिए स्वामी जी को आमंत्रित किया। कुतुबखाना घंटाघर के पास आर्य समाज ने यहां दयानंद चौक का गेट भी बनवाया है। बरेली के कुतुबखाना स्थित सब्जी मंडी एवं ऐतिहासिक मोती पार्क का कायाकल्प हुए बिना बरेली शहर में स्मार्ट सिटी की कल्पना बेमानी ही है। कुतुबखाना महादेव पुल के बनने से बेदखल हुए लोगों को कुतुबखाना सब्जी मंडी में नीचे भूमिगत वाहन पार्किंग ऊपर मल्टी स्टोरी दुकान बनाकर उन्हें निगम बसा दे तो कुतुबखाना का मोतीपार्क हरा भरा हरियाली वाला होकर एरिया का कायाकल्प हो सकता है। इसके जरूरी है कि बरेली के बीजेपी विधायक एवम प्रदेश के वन मंत्री डॉ अरुण कुमार, जनप्रतिनिधि एवं स्मार्ट सिटी के आला अधिकारी अगर वास्तव में जनता को सुविधाएं देने की इच्छाशक्ति रखते हो तो इसके लिए सब्जी मंडी में यहां उपलब्ध जमीन पर स्मार्ट सिटी या पीपी मोड में लखनऊ के हजरतगंज के जनपथ मार्केट या दिल्ली के कनॉट प्लेस पार्क के भूमिगत मार्केट एवम वाहन पार्किंग की तर्ज पर उसी प्रकार की योजना बनानी ही होगी। स्मरण रहे कुतुबखाना से होलसेल सब्जी मंडी वर्ष 1980 में डेलापीर पर बनी नई मंडी में स्थानांतरित हो चुकी है। कुतुबखाना होलसेल सब्जीमंडी वाले स्थल पर मल्टी पर्पज भूमिगत वाहन पार्किंग एवम दुकानेवबानाई जाए। साथ ही ऐतिहासिक मोती पार्क के अवैध अतिक्रमण हटाकर अब उसे हरा भरा कराया जाना भी जनहित में अब जरूरी ही है क्योंकि यहां उपरिगामी महादेव पुल भी बन गया है।

निर्भय सक्सेना

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