विक्रमादित्य के नाम से शुरू हुई भारतीय नववर्ष और विक्रम संवत्

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बदायूं। महाराजा वीर विक्रमादित्य भारत के महान शासक और आदर्श राजा के नाम से जाने जाते थे। न्याय प्रिय राजा विक्रमादित्य ताकत, हिम्मत और विद्वान नीतियों के लिए प्रसिद्ध थे। उन्होंने मां हरसिद्धि की उपासना कर न्याय करने की विशिष्ठ शक्ति प्राप्त की। मां के द्वारा प्रदत्त न्याय को ही सुनाया और उसको स्वीकार किया गया। राजा विक्रमादित्य के त्याग और समर्पण का लोगों ने सम्मान किया। भारतीय तिथियों की गणना इन्हीं के नाम विक्रम संवत के नाम से जानी जाने लगी। सूर्यवंश का गौरव बढ़ाया।

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सृष्टि की रचना के पश्चात ‘इक्ष्वाकु‘ (राजस्थान के सूर्यवंशी) जिन्होंने अयोध्या नगरी बसायी थी। इक्ष्वाकु के वंशज 68वीं वंशावली के अंतर्गत राजा दशरथ हुए, जिनके चार पुत्र थे। राम, लक्ष्मण, भरत, शत्रुघ्न। रामचंद्र जी के दो पुत्र हुए लव और कुश। लव से बडगुजर और राठौर, कुश से गेहलोत और कच्छावा हुए। कच्छावा रामचंद्र जी के पुत्र कुश की संतान हैं। रामायण वंशवृक्ष के अनुसार श्री रामचंद्र जी ने कुश को अयोध्या की गद्दी दी। कच्छावाओं को 25वीं वंशावली में ‘तक्षक‘ हुए। तक्षक शाखा की प्रशाखा ही मोर्य रही, जिसकी गणना बाद में परमारो में हुई। उस समय कई सम्राट भारत में आए और राज्य किया।
इसी परंपरा में परमार वंश में जिनके पूर्वज सूर्यवंशी थे। सम्राट वीर विक्रमादित्य (सूर्यवंशी) हुए। जिन्होंने उज्जयिनी में कई वर्षों तक राज्य किया। सूर्य चिन्ह अंकित ध्वजा को सम्मानित किया। आज भी सूर्यवंशी सम्राट वीर विक्रमादित्य की स्मृति में ‘‘विक्रम सम्वत्‘‘ को मानकर सूर्य चिन्ह अंकित कर उस ऐतिहासिक ध्वजा को सम्मान के साथ ध्वज चल समारोह के रूप में निकाला जाता है। विक्रम संवत में सभी शासक महाराज वीर विक्रमादित्य के पराक्रमों से परिचित और प्रभावित थे। अनेकों लोगों ने उन्हें आदर्श माना। विक्रमादित्य के शासनकाल को भारतीय इतिहास में स्वर्णिम युगों में याद किया जाता है।
सूर्यवंशी सम्राट वीर विक्रमादित्य भारत के सम्राट थे। इनके अधीन राजा और मंत्रीमंडल बैठता था। सम्राट का न्यायालय बड़ा था। विक्रमादित्य जीवन सत्यप्रिय, न्यायप्रिय और त्यागी था। सत्य और झूठ के बीच न्याय करना राजा विक्रमादित्य के लिए कठिन नहीं था। जब सत्य बोलने वाला कहता मैं सत्य हूं और झूंठ बोलने वाला कहता मैं भी सत्य हूं। किसी भी प्रांत का राजा जब सही न्याय करने में असमर्थ रहता थे तोे वह विक्रमादित्य के पास आते थे। विक्रमादित्य महाराज और मंत्रीमंडल देखते कि सत्य क्या है। यदि वह समझ नहीं आता तो ( राजा की ईष्ट देवी हरसिद्धि थी, हरसिद्धि 52 शक्तिपीठों में मां दुर्गा हैं और दुर्गा शप्तशती में दुर्गा के 32 नाम हैं। किताब में 32 पुतली नाम दर्शाया गया है, देशकाल पुरत्वे शब्द बदलते रहते हैं। दुर्गा 1$31 कुल 32 न्याय, साम, दाम, दंड, भेद, नीति, उपनीति इसकी गठड़ी 01 इसके भाग 31 एक-एक खाता, एक-एक दुर्गा राज्य मंत्रीमंडल से चलता) राजा मां हरसिद्धि सेे विनय किया और प्रश्न के लिए मां हरसिद्धि के श्रीचरणों में रखा। दुर्गा ने अपने हस्ताक्षर करके भेजा प्रमुख दुर्गा को जो कि खाते का प्रश्न था, इसके पश्चात प्रमुख दुर्गा ने प्रश्न का हल निकाल कर भेजा राजा के पास और राजा ने वह सत्य जनता को सुनाया। इस तरह सत्य और झूठ का न्याय चलता था। राजा विक्रमादित्य माता हरसिद्धि का ध्यान करके और वास्तविक न्याय को जानकर निर्णय देते थे। आज भारतीय तिथियों की गणना राजा विक्रमादित्य के नाम ‘‘विक्रम संवत्‘‘ के नाम जानी जाती है। भारतीय जन विक्रम संवत् के अनुसार शुभ तिथियों की गणना कर श्रेष्ठ कार्यों को करते हैं।

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