देश के “सर्वश्रेष्ठ किसान अवार्ड” को बस्तर के ‘डॉक्टर राजाराम त्रिपाठी’ के नाम की घोषणा

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दिल्ली। बस्तर व छत्तीसगढ़ के लिए एक बड़ी खुशखबरी आ रही है। जैविक पद्धति से दुर्लभ वनौषधियों की खेती के पुरोधा कहलाने वाले बस्तर कोंडागांव के किसान डॉ राजाराम त्रिपाठी को इस वर्ष का देश का “सर्वश्रेष्ठ किसान अवार्ड-2023 दिया जाएगा। अवार्ड के लिए योग्य उम्मीदवार के चयन हेतु गठित उच्चअधिकार प्राप्त ‘निर्णायक मंडल’ के द्वारा अंतिम रूप से डॉ राजाराम त्रिपाठी के नाम पर मुहर लगाते हुए, कल दिल्ली से इस आशय की सूचना प्रेषित की गई है, तथा उनके नाम की विधिवत घोषणा की गई है। डॉ राजाराम को यह प्रतिष्ठित सम्मान इसी 27 अप्रैल ,दिन गुरूवार को दिल्ली में आयोजित एक भव्य कार्यक्रम में देश के कृषि मंत्री के हाथों प्रदान किया जाएगा। क्यों दिया जा रहा है डॉ राजाराम को यह सम्मान ? डॉ त्रिपाठी को यह प्रतिष्ठित सम्मान उनके द्वारा जैविक खेती के क्षेत्र में किए गए दीर्घकालीन कार्यो, विशेष रूप से काली मिर्च की नई प्रजाति (MDBP-16) के विकास एवं बहुचर्चित एटी-बीपी माडल (AT-BP Model) अर्थात ऑस्ट्रेलियन-टीक (AT) के पेड़ों पर काली मिर्च (BP)की लताएं चढ़ाकर एक एकड़ जमीन से 50 एकड़ तक का उत्पादन लेने के सफल प्रयोग हेतु दिया जा रहा है। पिछले कई वर्षों से त्रिपाठी अपने इस प्रयोग को अन्य किसानों के साथ भी खुले दिल से साझा कर रहे हैं और अन्य किसानों की मदद भी कर रहे हैं। ऑस्ट्रेलियन टीक और काली मिर्च की खेती करने वाले देशभर के प्रगतिशील किसान प्रतिदिन उनके फार्म पर इसे देखने, समझने, सीखने और अपने खेत पर भी इस खेती को करने हेतु आते हैं। क्या है आस्ट्रेलियन टीक (AT) ? उल्लेखनीय है कि इनकी संस्था द्वारा विकसित ऑस्ट्रेलियन-टीक की विशेष प्रजाति जो कि देश के सभी भागों की शहर तरह की जलवायु में विशेष सिंचाई अथवा देखभाल के बहुत तेजी से आगे बढ़ता है। इसके बढ़ने की गति महोगनी, शीशम, टीक, मिलिया डुबिया यहां तक कि नीलगिरी से भी ज्यादा है। यह पेड़ लगभग 7 से 10 साल में ही काफी ऊंचा और मोटा हो जाता है। यह सागौन,महोगनी, शीशम से भी बेहतरीन मजबूत, हल्की, खूबसूरत बहुमूल्य इमारती लकड़ी देता है। इतना ही नहीं यह पेड़ अन्य इमारती पेड़ों की तुलना में 2 गुना लकड़ी देता है। इसका एक और महत्वपूर्ण फायदा यह है कि यह पेड़, वायुमंडल से नाइट्रोजन लेकर फसलों की नाइट्रोजन यानी ‘यूरिया’ की आवश्यकता को जैविक विधि से भली-भांति पूर्ति करता है। इन पेड़ों पर चढ़ाई गई काली मिर्च की लताओं से मिलने वाली काली-मिर्च के भरपूर उत्पादन से प्रतिवर्ष अतिरिक्त लाभ भी होता है।इसे ही “कोंडागांव का एटी-बीपी माडल” कहा जाता है। डॉक्टर त्रिपाठी का यह सफल मॉडल (AT-BP) इस समय लगभग 25 राज्यों के प्रगतिशील किसानों के द्वारा सफलतापूर्वक अपनाया जा चुका है । बस्तर के कई आदिवासी किसानों के खेतों में भी अब इस नई प्रजाति की काली मिर्च की फसल लहलहाने लगी है। 2- क्या है AT-BP से तैयार डॉ राजाराम का “प्राकृतिक ग्रीन हाउस माडल” जिसने दिलाया अवार्ड” ?
दरअसल इनके द्वारा ऑस्ट्रेलियन टीक और काली मिर्च का विशेष तकनीक से किया गया प्लांटेशन का यह माडल ‘प्राकृतिक ग्रीनहाउस’ की तरह कार्य करता है। एक और जहां वर्तमान तकनीक के पोलीथीन से कवर्ड तथा लोहे के फ्रेम वाले पालीहाउस बनाने में 1 एकड़ में लगभग 40 लाख का खर्च आता है, वहीं डॉक्टर त्रिपाठी के द्वारा विकसित “प्राकृतिक ग्रीन हाउस” के निर्माण में कुल मिलाकर प्रति एकड़ केवल “डेढ़ लाख” रुपए का खर्च आता है। यानी कि डेढ़ लाख रुपए में पालीहाउस से हर मायनों में बेहतर ,ज्यादा टिकाऊ और शत-प्रतिशत सफल ग्रीनहाउस तैयार हो जाता है। सबसे बड़ी बात यह है कि इस 40 लाख रुपए प्रति एकड़ में लोहे और प्लास्टिक से बनने वाले पालीहाउस की आयु ज्यादा से ज्यादा 7 से 10 साल की होती है, और फिर तो यह कबाड़ के भाव बिकता है। जबकि डॉ राजाराम त्रिपाठी के द्वारा तैयार नेचुरल ग्रीन हाउस बिना किसी अतिरिक्त लागत की 10 साल में करोड़ों की बहुमूल्य इमारती लकड़ी देने के लिए तैयार हो जाता है, इसकी आयु 20 से 25 वर्ष तक होती है, साथ ही प्रति एकड़ रुपए 5 से ₹10 लाख तक काली मिर्च से सालाना नियमित आमदनी भी मिलने लगती है। भारत जैसे देश के लिए यह मॉडल गेम-चेंजर माना जा रहा है

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इन्हीं अनूठे नवाचारों के लिए उन्हें इस वर्ष किसानों को दिया जाने वाला देश का सबसे प्रतिष्ठित सम्मान डॉ राजाराम त्रिपाठी दिया ज…
(दीपक कुमार त्यागी / हस्तक्षेप
स्वतंत्र पत्रकार )
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