मोहर्रम की तैयारियां शुरू, इमामबाड़ों में रंग-रोगन का काम तेज

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बरेली। इस्लामिक कैलेंडर के मुताबिक मोहर्रम नए साल का पहला महीना है। यह महीना हमें हक (सच्चाई) और सब्र (धैर्य) की सीख देता है। बरेली में मोहर्रम का महीना हजरत इमाम हुसैन और कर्बला के शहीदों की याद में पूरी शिद्दत व अकीदत के साथ मनाया जाता है। इस दौरान जगह-जगह लंगर और सबीलों के आयोजन के साथ इमामबाड़ों में ‘जिक्र-ए-हुसैनी’ की महफिलों का सिलसिला चलता है। इसी कड़ी में शहर में मोहर्रम को लेकर तैयारियां जोरों पर शुरू हो चुकी हैं।
​इमामबाड़ों में शुरू हुआ रंग-रोगन का काम
​मलूकपुर चौकी स्थित ऐतिहासिक इमामबाड़ा फतेह निशान के मुतावल्ली जाफर और अहमद उल्लाह वारसी ने बताया कि पहली मोहर्रम से ही इमामबाड़े में तारीखों के हिसाब से प्रोग्राम शुरू हो जाते हैं। यहां बड़ी तादाद में दूर-दराज से अकीदतमंद हाजिरी के लिए आते हैं, जिसके मद्देनजर इमामबाड़े में रंग-रोगन और साफ-सफाई का काम तेजी से चल रहा है।
​इसी तरह, सुभाष नगर पुरवा बब्बन खाँ बस्ती स्थित पुश्तैनी इमामबाड़ा चुम्मन बी के आसिफ खान ने बताया कि मोहर्रम के मद्देनजर सभी जरूरी तैयारियां वक़्त से पहले मुकम्मल की जा रही हैं।​भारत और दुनियाभर में चांद दिखने के आधार पर मोहर्रम का महीना 16 जून 2026 (मंगलवार) से शुरू होने की उम्मीद है। इसी के साथ इस्लामिक साल 1448 हिजरी का आगाज हो जाएगा। मोहर्रम का सबसे प्रमुख दिन (10वीं तारीख), जिसे ‘आशूरा’ कहा जाता है, चांद की संभावित तारीख के मुताबिक 26 जून 2026 (शुक्रवार) को मनाया जाएगा।
​मुहर्रम को मुख्य रूप से कर्बला की महान शहादत के लिए याद किया जाता है। यह ऐतिहासिक शहादत 61 हिजरी (680 ईसवी) में इराक के ‘कर्बला’ मैदान में हुई थी। इस्लाम के आखिरी पैगंबर, पैगंबर-ए-इस्लाम के नवासे हजरत इमाम हुसैन और उनके 72 साथियों (जिसमें उनके परिवार के मासूम बच्चे और महिलाएं भी शामिल थीं) को यजीद की जालिम फौज ने तीन दिनों तक भूखा-प्यासा रखकर शहीद कर दिया था।
​हक और इंसाफ की जंग: यजीद एक क्रूर और अधर्मी शासक था, जो हजरत इमाम हुसैन से अपने कुशासन के लिए जबरदस्ती वफादारी की बैअत (सहमति) चाहता था। हजरत इमाम हुसैन ने जुल्म के आगे झुकने से साफ इनकार कर दिया और इंसानियत, हक और इंसाफ को बचाने के लिए अपने पूरे कुनबे की शहादत दे दी।गंबर-ए-इस्लाम ने भी इस पाक महीने में रोजा रखने की परंपरा को कायम रखा था। आज भी सुन्नी समुदाय के लोग मुहर्रम की 9 और 10 तारीख, या फिर 10 और 11 तारीख को बेहद अदब के साथ नफ्ली रोजे रखते हैं।

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​समाजसेवी पम्मी खाँ वारसी ने कहा कि मुहर्रम का महीना केवल नए साल की शुरुआत भर नहीं है, बल्कि यह जुल्म के खिलाफ मजबूती से डटने, सब्र रखने और सच्चाई के लिए अपना सब कुछ न्योछावर कर देने की याद दिलाता है। हक़,सचाई और इंसानियत की हिफाजत के लिए ही हजरत इमाम हुसैन ने शहादत को कुबूल किया था, जो पूरी दुनिया के लिए एक मिसाल है।

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