अंतर्राष्ट्रीय कॉन्फ्रेंस RTPAS-2025 के दूसरे दिन 50 शोधपत्र प्रस्तुत

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बदायूँ। राजकीय महाविद्यालय के वनस्पति विज्ञान एवं प्राणी विज्ञान विभाग के संयुक्त तत्वावधान में चल रहे तीन दिवसीय इंटरनेशनल कॉन्फ्रेंस के दूसरे दिन के तकनीकी सत्रों में आमंत्रित वक्ताओं ने अपने शोधपरक व्याख्यान प्रस्तुत किए। इसके अतिरिक्त देश विदेश के विभिन्न संस्थानों से लगभग 50 शोधार्थियों और प्राध्यापकों ने अपने शोध-पत्र प्रस्तुत किए। प्रस्तुत व्याख्यानों और शोधपत्रों में जैव विविधता संरक्षण, पर्यावरणीय प्रबंधन, नैनो टेक्नोलॉजी, पशु विज्ञान एवं सतत विकास जैसे विविध विषयों पर गंभीर चर्चा हुई। काशी हिन्दू विश्वविद्यालय, वाराणसी के प्राणी विज्ञान के प्रोफेसर डॉ. अखिलेंद्र कुमार मौर्य ने हाइपोक्सिया ऑक्सीजन की कमी से होने वाले मस्तिष्कीय प्रभावों हइपोक्सिया पर अपने व्याख्यान प्रस्तुत किए।
उन्होंने बताया कि हाइपोक्सिया की स्थिति में मस्तिष्क में ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस बढ़ जाता है, जिससे स्मृति ह्रास और संज्ञानात्मक क्षमताओं में कमी देखने को मिलती है। नए शोध में पाया गया कि इस स्थिति में न्यूरॉन्स से जुड़े प्रोटीन्स तथा हिस्टोन एसीटिलेशन में असंतुलन होती है, जो न्यूरोडीजेनेरेशन तंत्रिका क्षति की ओर ले जाती है। डॉ. मौर्य ने बताया कि बाकोपा मोनिएरी एक्सट्रैक्ट (BME) एवं HDAC इनहिबिटर (सोडियम ब्यूटिरेट) के उपचार से हाइपोक्सिक चूहों में न केवल न्यूरोडीजेनेरेशन कम हुआ, बल्कि स्मृति और सीखने की क्षमता भी सुरक्षित रही। यह उपचार BDNF जीन की सक्रियता को बढ़ाता है, जिससे CREB सिग्नलिंग पाथवे के माध्यम से न्यूरॉन्स की संरचना और कार्यप्रणाली में सुधार होता है।
चीन के लांझोउ विश्वविद्यालय के कॉलेज ऑफ इकॉलॉजी की प्रोफेसर डॉ मिनहुई बी ने एक्सप्लोरिंग प्लांट स्टॉमटल रेगुलेशन मैकेनिज्म अंडर ड्रॉफ्ट एंड रिहाइड्रेशन विषय पर शोध व्याख्यान देते हुए पौधों की स्टोमेटल विनियमन प्रणाली पर प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि जल की उपलब्धता में उतार-चढ़ाव के दौरान पौधों के रंध्रों का व्यवहार महत्वपूर्ण है। उन्होंने बताया कि शोध के दौरान विभिन्न पादप समूहों में सूखे की स्थिति में होने वाली रंध्र-प्रतिक्रियाओं की तुलना की गई तथा इसके पीछे कार्यरत शारीरिक एवं जैव-रासायनिक तंत्र की गहन पड़ताल की गई। उनके शोध से पता चला कि पौधे अपनी जीवित रहने की क्षमता और प्रदर्शन को बनाए रखने हेतु जल उपलब्धता और रंध्र नियंत्रण के बीच संतुलन कैसे स्थापित करते हैं। प्रथम तकनीकी सत्र का संचालन पंजाब विश्वविद्यालय, चंडीगढ़ की डॉ. अर्चना चौहान ने किया तथा द्वितीय सत्र का संचालन डॉ. हरिसिंह गौर विश्वविद्यालय, सागर मध्य प्रदेश की डॉ. आरती गुप्ता ने किया। प्राचार्य डॉ श्रद्धा गुप्ता ने कहा कि शोध की सार्थकता सदैव मानव समाज और पर्यावरण के हित में होनी चाहिए। आयोजन समिति की संयोजक डॉ. प्रियंका सिंह और डॉ. गौरव कुमार सिंह अतिथि वक्ताओं का परिचय कराया। कॉन्फ्रेंस के समन्वयक डॉ. सचिन कुमार ने सभी के प्रति आभार ज्ञापित किया।

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