स्वयं भागवत बने तभी परं ब्रह्म परमात्मा की प्राप्ति हो सकती है

बरेली । प्राचीनतम एवं भव्यतम बाबा त्रिवटीनाथ मंदिर में संगीतमयी श्रीमद्भागवत महापुराण कथा के द्वितीय दिवस
वृंदावन के सुप्रसिद्ध कथा व्यास पं. सुरेश शास्त्री ने कहा कि श्रीमद्भागवत वास्तव में अपने चित् को सत्य के साथ कर्म शील रखते हुए भगवान का ध्यान करते हुए परमानंद की प्राप्ति करने का बहुत सीधा सा मार्ग है। कथा व्यास कहते हैं कि मनुष्य को मंगल की कामना हेतु मंगलाचरण करना चाहिए । “जीवनं त्वं मंगलं त्वं” तभी संभव है जब जीव स्वयं भागवत बने तभी परं ब्रह्म परमात्मा की प्राप्ति हो सकती है।जैसे शुकदेव और परीक्षित दोनों को ही गर्भ में भगवान विष्णु के दर्शन हुए अर्थात परमात्मा ने स्वयं शुकदेव रूप में आकर परीक्षित को कथा सुना कर कल्याण और प्रकाश का मार्ग प्रशस्त किया। कथा व्यास कहते हैं कि समय समय पर परमात्मा अपनी संतान रूपी जीव को अंधकार से मुक्त कराने के लिए कोई न कोई माध्यम भेजते हैं।कभी वह किसी अवतार रूप में अथवा कभी किसी संत के रूप में। कथा व्यास कहते हैं कि भगवान विष्णु के पांचवें अवतार कपिल मुनि ने पिता कर्दम ऋषि और माता देवहूति के यहां जन्म लिया और भागवत धर्म के प्रमुख बारह आचार्यों में से एक हैं। कथा व्यास कहते हैं कि जीवन का सार है कि माँ अपने गर्भ से संतान को जन्म देती है उसी प्रकार परमात्मा इस पूरी सृष्टि को जन्म बिना किसी हित के देते हैं।
कथा व्यास बताते हैं कि तुलसीदास जी ने मानस में कहा है कि
“कबहुँक करि करूणा नर देही
देत ईश बिनु हेतु सनेही”
कबहुँक अर्थात कभी कभी देते हैं,बार बार नहीं देते हैं।
करि करूणा और बिनु हेतु सनेही अर्थात चौरासी लाख योनियों में कष्ट भोगते हुए अकारण परमात्मा की कृपा जीव पर होती है और उसे मनुष्य जन्म प्राप्त होता है ।
कथा व्यास कहते हैं कि मनुष्य यदि भक्ति के मार्ग पर सत्संग करके निश्चित ही भगवान को प्राप्त करके समस्त दुखों से तथा इन चौरासी लाख योनियों में भटकने से मुक्त हो सकता है।
कथा व्यास कहते हैं कि भीष्म पितामह ने दुर्योधन का साथ होने पर भी भगवान की भक्ति करना नहीं छोड़ा और सदैव परमात्मा का चिंतन करते रहे। भगवान को भक्ति के बल पर उनकी मृत्यु के समय आने पर विवश होना पड़ा और भीष्म पितामह का कल्याण संभव हुआ। प्रभु की भक्ति के कारण भीष्म पितामह को कीर्ति और यश की प्राप्ति होती है परंतु जब मनुष्य त्याग करता है तभी ऐसा संभव हो पाता है।
कथा व्यास कहते हैं कि विदुर जी की भक्ति और प्रभु के प्रति समर्पण का भाव ही था जोकि श्री कृष्ण को दुर्योधन के छप्पन भोग को छोड़कर विदुर जी के दाल भात खाने के लिये खींच कर ले आता है।
कथा व्यास कहते हैं कि भक्तों के प्रबल प्रेम के कारण प्रभु के नियम बदल जाते हैं।जो अधर्म के साथ था परंतु उसकी भक्ति के कारण उसको ज्ञान देकर मुक्ति की प्राप्ति होती है।
आज की कथा के उपरांत वहां उपस्थित काफी संख्या में भक्तजनों ने श्रीमद्भागवत की आरती करी तथा प्रसाद वितरण हुआ।
आज के कार्यक्रम में मंदिर सेवा समिति के प्रताप चंद्र सेठ, मीडिया प्रभारी संजीव औतार अग्रवाल तथा सुभाष मेहरा का मुख्य सहयोग रहा।