डॉ. जाकिर हुसैन ने मुल्क की आजादी में शिक्षा को बनाया हथियार, नायकों में कलम-भाषणों से भरा जोश

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बरेली। भारत के स्वतंत्रता आंदोलन की जब-जब बात होती है, तो अक्सर राजनीति के अग्रिम पंक्ति के नाम ही चर्चित होते हैं। मगर, इतिहास के उस स्वर्णिम अध्याय में कुछ ऐसी शख्सियतें भी थीं। जिन्होंने बगैर हथियार उठाए, बिना भाषणों की गूंज के समाज और शिक्षा को दिशा देकर आज़ादी की लड़ाई में निर्णायक भूमिका निभाई। डॉ. ज़ाकिर हुसैन इन्हीं में से एक थे। एक शिक्षाविद, राष्ट्रनिर्माता और भारत के पहले मुस्लिम राष्ट्रपति, जिनका जीवन प्रेरणा और आदर्श का प्रतीक है। 8 फरवरी 1897 को हैदराबाद के एक धनाढ्य पठान परिवार में जन्मे ज़ाकिर हुसैन के जीवन की असल नींव उत्तर प्रदेश में पड़ी। उनके पिता कुछ वर्षों बाद उत्तर प्रदेश आ गए थे, और वहीं से ज़ाकिर हुसैन का शैक्षिक और सामाजिक जीवन आकार लेने लगा। अलीगढ़, बरेली, आगरा, लखनऊ, इलाहाबाद और मुरादाबाद की भूमि ने उनके जीवन मूल्यों को पोषित किया और उन्हें वह दृष्टि दी। जिससे वे एक शिक्षाविद से एक राष्ट्रपुरुष बन सके। शिक्षा, उर्दू-संस्कृति और समाज-सुधार के केंद्र के रूप में इन नगरों की भूमिका ने उनके व्यक्तित्व को परिष्कृत किया। आज यानी 3 मई को देश के पहले मुस्लिम राष्ट्रपति की पुण्यतिथि (वरसी) है। जिसके चलते सपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव से लेकर इंडिया गठबंधन के दलों के प्रमुख नेताओं और केंद्र सरकार के जिम्मेदारों ने खिराज-ए-अकीदत पेश (श्रद्धांजलि) की है। सिर्फ 23 वर्ष की उम्र में शिक्षा को बनाया आज़ादी का माध्यम
डॉ. ज़ाकिर हुसैन की आज़ादी की लड़ाई बंदूक की नहीं, कलम की लड़ाई थी। 1920 में गांधीजी के आह्वान पर जब राष्ट्रवादी नेताओं ने ब्रिटिश हुकूमत के सरकारी शिक्षण संस्थानों का बहिष्कार किया, तब ज़ाकिर हुसैन ने ‘जामिया मिल्लिया इस्लामिया’ की स्थापना में अग्रणी भूमिका निभाई। महज 23 वर्ष की उम्र में उन्होंने यह ज़िम्मेदारी ली, और आने वाले दो दशकों तक संस्था को देशभक्ति, आधुनिक शिक्षा और आत्मनिर्भरता की मिसाल में बदल दिया। जर्मनी के बर्लिन विश्वविद्यालय से अर्थशास्त्र में पीएचडी करने के बावजूद उन्होंने विदेश में अपना करियर नहीं बनाया, बल्कि भारत लौटकर जामिया को अपनी कर्मभूमि बना लिया। जब 1927 में जामिया बंद होने की कगार पर था, तब डॉ. हुसैन ने 21 वर्षों तक संस्था को अपने नैतिक नेतृत्व से बचाए रखा। और स्टूडेंट के जूतों पर करने लगे पॉलिश डॉ. ज़ाकिर हुसैन केवल एक प्रशासक नहीं थे, वे एक अनुशासनप्रिय मार्गदर्शक थे। छात्रों में अनुशासन जगाने के लिए उनका प्रसिद्ध प्रसंग — जब वे स्वयं विश्वविद्यालय के गेट पर बैठकर छात्रों के जूते पॉलिश करने लगे — यह दर्शाता है कि वे नेतृत्व का अर्थ केवल आदेश देना नहीं, बल्कि उदाहरण बनना मानते थे। स्वतंत्र भारत में उनका योगदान शिक्षा और राजनीति के संगम का उदाहरण है। वे अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के कुलपति बने। इस दौरान बरेली, बदायूं, पीलीभीत, मुरादाबाद समेत रुहेलखंड के जिलों में आजादी के नायकों में अक्सर जोर भरने आते थे। पाकिस्तान बनने के थे कट्टर विरोधी मुल्क की आजादी के बाद पाकिस्तान की मांग उठने लगी। मगर, डॉ.जाकिर हुसैन ने हमेशा पाकिस्तान बनने का विरोध किया। उन्होंने पाकिस्तान के खिलाफ वातावरण तैयार करने में अग्रणी भूमिका निभाई। वे राज्यसभा के सदस्य रहे, बिहार के राज्यपाल बने, और फिर 1962 में उपराष्ट्रपति पद पर निर्वाचित हुए। 13 मई को बने राष्ट्रपति, और 3 मई को इंतकाल डॉ.जाकिर हुसैन ने 13 मई 1967 को भारत के राष्ट्रपति का पद ग्रहण किया। वे पहले मुस्लिम राष्ट्रपति बने, और दुर्भाग्यवश, कार्यकाल के दौरान ही 3 मई 1969 यानी आज ही के दिन उनका निधन हो गया। वे अपने पद पर रहते हुए निधन होने वाले पहले राष्ट्रपति भी बने। भारत सरकार ने 1963 में उन्हें देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान ‘भारत रत्न’ से सम्मानित किया। वे यूनेस्को, विश्वविद्यालय अनुदान आयोग, प्रेस परिषद और राष्ट्रीय शिक्षा आयोग जैसी संस्थाओं से भी जुड़े रहे। दिल्ली की जामिया मिल्लिया इस्लामिया विश्वविद्यालय आज भी उनके विचारों की सजीव प्रतिमा है, जहाँ देशभर से छात्र उच्च शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं। एक युगदृष्टा, जो आने वाली पीढ़ियों का मार्गदर्शन डॉ. ज़ाकिर हुसैन ने शिक्षा और नैतिकता से समाज को बदलने में अहम भूमिका निभाई। वे सबसे प्रभावशाली रहे। उन्होंने स्वतंत्रता आंदोलन को बौद्धिक आधार दिया, शिक्षा को भारतीयता से जोड़ा, और राष्ट्र के सर्वोच्च पद पर बैठते हुए भी सादगी व नैतिकता को नहीं छोड़ा। उत्तर प्रदेश की धरती और बरेली जैसे शहर आज गर्व से कह सकते हैं कि उन्होंने एक ऐसे महामानव को गढ़ा, जिसने भारत को सिर्फ नेतृत्व नहीं दिया, बल्कि मूल्य दिए।

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