गोरखपुर में शहर के बड़े और नए घरानों की चौखट पर संकट, तलाश रहे सुरक्षित ठिकाना

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गोरखपुर। आराजी छावनी (गोलघर और सिविल लाइंस) और शहर के दूसरे ठिकानों पर बने लोगों के व्यावसायिक और आवासीय परिसरों की चौखट संकट में आ गई है। नजूल नीति के तहत जिन परिसर की लीज फ्री होल्ड नहीं हो सकी है, उन्हें सरकार वापस ले सकती है। ऐसे में काली मंदिर से लेकर टाउनहाल चौराहा, इंदिरा बाल विहार से लेकर विश्वविद्यालय चौराहे तक की सीमा की चौहद्दी नजूल नीति के दायरे में आ सकती है।सिविल लाइंस में अभी हाल के दिनों में कई बड़े औद्योगिक संस्थानों को संचालित किया जा रहा है। उन्होंने अनजाने में लीज की जमीन लेकर उसपर बैनामा लेने के बाद अपना निर्माण करवाया था। नजूल रिकाॅर्ड के अनुसार, इसमें से कई का फ्री होल्ड हुए बिना ही लोगों के नाम पर गलत तरीके से बैनामा हो गया है। शासनादेश के बाद जब जिल्द बंदोबस्त से 1903 से लेकर 1956 की लीज और बैनामा डीड खंगालने पर ये तथ्य सामने आए हैं।इसमें कई ऐसे भी हैं, जिन्होंने लीज होने के बाद अपना किराया तक जमा नहीं किया है। ऐसे ही एक लीज की जमीन अराजी छावनी में है। 1945 में करीब चार एकड़ की इस संपत्ति की लीज हुई थी और उस वक्त सालाना 64 रुपये लीज शुल्क जमा करना था।लेकिन, इन लोगों ने इस किराए को भी अभी तक जमा नहीं किया है। किराएदारी के संबंध में कोई भी रिकाॅर्ड नजूल में नहीं है। ऐसे में पहले ही ये लोग दोषी हो जाएंगे। इसके अलावा आजादी के बाद 1954 में भारत सरकार ने बहुत सी निजी भूमि का भूमि अधिग्रहण अधिनियम (लैंड एक्विजिशन 1954) के तहत समावेशन कर लिया था।लेकिन, तत्कालीन लोगों ने नियम व शर्तें का उल्लंघन कर उस परिसर का व्यावसायिकरण करवा दिया। इसके रिकार्ड भी लीज और तत्कालीन समय से बैनामा डीड के रिकार्ड में है। अब, नजूल नीति के बाद हाल में इन जमीनों पर बड़ा निवेश कर व्यापार शुरू करने वालों की परेशानी बढ़ गई है।उन्हें डर है कि कहीं उनकी संपत्ति फ्री होल्ड नहीं निकली तो उनका किया निवेश भी शून्य हो जाएगा। सूत्र बताते हैं कि वर्तमान में इन जमीनों पर व्यापार करने वालों ने पुराने रईस परिवारों से संपर्क करना शुरू कर दिया है। वह उनसे लीज के फ्री होल्ड और कागजों की मांग कर रहे। रईस परिवार भी 1903 से लेकर 1976 तक के कागजों की बात बोलकर उन्हें वापस नजूल और प्रशासन से ही संपर्क करने की सलाह दे रहे हैं।नजूल विभाग के रिकाॅर्ड के अनुसार, 1843 की जिल्द बंदोबस्त में जमीनों को मकबूजा और मकसूजा में दर्ज किया जाता था। इसमें मकबूजा जमींदारों की जमीनें होती थीं, जिनपर तत्कालीन समय रेवेन्यू रिकाॅर्ड में हाता कोठी दर्ज होता था। इन कोठियों को जमींदार सरकार को किराए पर देते थे।जैसे, शहर के आराजी छावनी में बने बंगले। इन बंगलों को हाता कोठी कहा जाता था। इसके अलावा रेवेन्यू रिकाॅर्ड में जो जमीनें सरकार के कब्जे में होती थीं, वे मकसूजा होती थी। उन जमीनों को हाता जंगल कहा जाता था। इन जमीनों पर पेड़, बागीचे, जंगल होत थे। इन जमीनों में भी 1903 के बाद से देश आजाद होने के बाद खेल कर दिया गया। नजूल रिकार्ड की जांच हुई तो आराजी छावनी के जिल्द में दर्ज चार एकड़ हाता जंगल की जमीन फिर से सरकार को मिल सकती है।गोरखपुर विकास प्राधिकरण ने शहर में सीलिंग की जमीनों का ऑक्शन निकाला था। बाकायदा शहर में लीज की जमीनों की एक पुस्तक 2005 में छापी गई थी। इसके आधार पर तत्कालीन समय में सीलिंग जमीन पर ऑक्शन निकाला गया था।इसके द्वारा इच्छुक लोग दावा कर उस जमीन का व्यावसायिक प्रयोग भी कर सकते थे। शहर के कुछ लोगों ने इसमें आवेदन भी किया था और तत्कालीन अधिकारियों ने आदेश भी जारी किया था, लेकिन बीच में ही किसी कारणवश उसे रोक दिया गया। अगर इस पुस्तक को फिर से प्रशासन संज्ञान में ले ले और उसमें दर्ज जमीनों की पड़ताल शुरू करवा दे तो और भी लीज, सीलिंग की जमीन का खेल सामने आ सकता है।

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