रूस में लोग वैक्सीन लेने से रहे कतरा, अमेरिका में बुजुर्ग नहीं हैं तैयार

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मॉस्को/वाशिंगटन। रूस में विकसित कोविड-19 के टीका ‘स्पूतनिक वी’ पर लोगों की मिली जुली प्रतिक्रिया देखने को मिली है. बता दें कि रूस की सरकार और मीडिया ने ‘स्पूतनिक वी’ टीका को 11 अगस्त को मंजूरी दिए जाने के बाद इसे बहुत बड़ी उपलब्धि बताया था. लेकिन, आम लोगों के बीच टीका को लेकर बहुत उत्साहजनक प्रतिक्रिया नहीं दिख रही और कई लोग इसके कारगर और सुरक्षित होने को लेकर संदेह जता रहे हैं. प्रायोगिक परीक्षण के सभी चरण को पूरा नहीं करने के लिए रूस को आलोचना का भी सामना करना पड़ा है. देश और विदेश के विशेषज्ञों ने टीका के मूल्यांकन का काम पूरा होने तक इसके व्यापक इस्तेमाल करने के खिलाफ आगाह भी किया. हालांकि प्रशासन ने सुझावों की उपेक्षा करते हुए अग्रिम मोर्च पर काम करने वाले स्वास्थ्यकर्मियों समेत जोखिम वाले समूहों को टीका देने की शुरुआत कर दी. टीका विकसित करने वाले गमालेया इंस्टीट्यूट के प्रमुख अलेक्जेंडर गिंट्सबर्ग ने पिछले सप्ताह कहा था कि रूस के डेढ़ लाख से ज्यादा लोगों को टीके की खुराक दी जा चुकी है.

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अस्पताल ही नहीं आ रहे लोग
मॉस्को से करीब 500 किलोमीटर दूर वोरोनेझ में आईसीयू विशेषज्ञ अलेक्जेंडर जस्टसेपीन ने भी टीके की खुराक ली. उन्होंने कहा कि टीका लेने के बावजूद वह एहतियात बरत रहे हैं क्योंकि इसके असर के बारे में अध्ययन अब तक पूरा नहीं हुआ है. ब्रिटेन ने दो दिसंबर को फाइजर के टीके को मंजूरी दे दी थी. इसके बाद टीका निर्माण को लेकर होड़ में पीछे छूटने की आशंका के चलते रूस ने भी बड़े स्तर पर टीकाकरण की शुरुआत कर दी. रूस ने अपने देश में विकसित टीके को महज कुछ दर्जन लोगों पर क्लीनिकल परीक्षण के बाद ही उसे इस्तेमाल करने की मंजूरी दे दी. टीका निर्माताओं ने इसे ‘स्पूतनिक वी’ नाम दिया. इस तरह इसका संदर्भ शीत युद्ध के दौरान सोवियत संघ द्वारा 1957 में छोड़े गए पहले उपग्रह के साथ जोड़ा गया.
ब्रिटेन में टीके की खुराक सबसे पहले बुजुर्गों को दी जा रही है जबकि ‘स्पूतनिक वी’ की खुराक 18 साल से 60 के उम्र के लोगों को दी जा रही है. टीका निर्माताओं ने कहा है अध्ययन से पता चला है कि स्पूतनिक टीका 91 प्रतिशत कारगर रहा. करीब 23,000 प्रतिभागियों पर किए गए अध्ययन से यह नतीजा निकाला गया। जबकि, पश्चिमी देशों ने परीक्षण में ज्यादा लोगों, अलग अलग पृष्ठभूमि, उम्र के लोगों को शामिल किया. रूस में सर्वेक्षण कराने वाले एक स्वतंत्र संगठन लेवादा सेंटर ने अक्टूबर में रायशुमारी करायी थी, जिसमें 59 फीसदी लोगों ने कहा था कि वे टीका की पेशकश करने के बावजूद इसे नहीं लेना चाहेंगे. कुछ स्वास्थ्यकर्मियों और शिक्षकों से बातचीत करने पर चलता चला कि सही तरह से परीक्षण नहीं किए जाने के कारण वे टीका नहीं लेना चाहते हैं.

अमेरिका में बुजुर्ग नहीं हैं तैयार
अमेरिका में फाइजर की कोरोना वैक्सीन का इस्तेमाल शुरू हो गया है. जल्द ही मॉडर्ना की वैक्सीन को भी रेगुलेटरी अनुमति मिलने वाली है. दोनों वैक्सीन के बारे में दावा किया गया है कि वे 95 फीसदी असरदार हैं और सुरक्षित भी हैं. जिस एडवाइजरी समिति ने वैक्सीन को स्वीकृति दी है उसकी भी एक सदस्य ने बुजुर्गों में इसके इस्तेमाल के खिलाफ वोट डाला था. समिति की सदस्य डॉक्टर हेलेन कीप टालबोट का मानना है कि वैक्सीन को अभी आपातकालीन इस्तेमाल की अनुमति मिली है. इसे उस तरह नहीं परखा गया है जिस तरह आमतौर पर वैक्सीन की टेस्टिंग होती है. अगर बुजुर्गों में वैक्सीन असरदार नहीं रही या ज्यादा साइड इफेक्ट हुए तो लोगों में घबराहट हो सकती है. हालांकि, समिति के अन्य विशेषज्ञ कह रहे हैं कि अब तक के साक्ष्यों के अनुसार यह कहा जा सकता है कि वैक्सीन सुरक्षित है और बुजुर्गों सहित किसी को भी इससे घबराना नहीं चाहिए.

बुजुर्गों में वैक्सीन को लेकर आंशकाएं सनोफी के टेस्ट रिजल्ट के बाद बढ़ी है. सनोफी और ग्लैक्सो स्मिथ क्लाइन ने कहा था कि ट्रायल के नतीजे उम्मीद के अनुसार नहीं रहे और वैक्सीन अधिक उम्र के लोगों में ज्यादा असरदार साबित नहीं हो रही है. इसलिए सनोफी की वैक्सीन 2021 के अंत तक टाल दी गई है. हालांकि, फाइजर और मॉडर्ना दोनों ने दावा किया है उनकी वैक्सीन बुजुर्गों में भी पूरी तरह असरदार है. अमेरिका में कोरोना के कारण होने वाली करीब 40 फीसदी मौतें नर्सिंग होम में रहने वाले लोगों की हुई है. वैक्सीन को अभी नियमित इजाजत की जगह आपातकालीन अनुमति मिली है और इससे आधे अमेरिकी आशंकित हैं. वर्जीनिया कॉमनवेल्थ यूनिवर्सिटी के एक सर्वे के मुताबिक सिर्फ 46.9 फीसदी लोगों ने ही कहा है कि वे निश्चित रूप से वैक्सीन लेंगे. वहीं, अगर वैक्सीन को नियमित इजाजत मिले तो करीब 60 फीसदी लोग इसकी डोज लगाने के लिए तैयार हैं.

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