श्रद्धानंद जैसे निर्भीक, निडर और अडिग संन्यासी देने का गौरव जाता है बरेली को — निर्भय सक्सेना —

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बरेली में आर्य समाज की देन हैं कई शिक्षण संस्थान
    
    
बरेली। आर्य समाज के स्वामी श्रद्धानंद जैसे निर्भीक, निडर और अडिग संन्यासी देने का गौरव यदि किसी नगर को जाता है तो वह है बरेली। वर्ष 1879 से ही यहां आर्य समाज की गतिविधियां चल रही हैं। यही नहीं बरेली में जहाँ आर्य विद्वानों ने अपनी विद्वता का लोहा मनवाया। साथ ही शिक्षा जगत में कई नामी संस्थाओं की भी स्थापना भी कराई। बरेली के कई आर्य समाज के विद्वान देश प्रदेश में प्रवचन को भी निरंतर जाते रहे उनमें बिहारी लाल शास्त्री, इंद्रदेव यति, चंद्र नारायण सक्सेना उर्फ भ्राता जी, संतोष कुमार कण्व आदि के साथ ही आचार्य विशुद्धनंद, सावित्री शर्मा प्रमुख रहे । संचार क्रांति आने के बाद अब डॉ श्वेतकेतु शर्मा ऑनलाइन आर्य समाज के विद्वानों के प्रवचन, परिचर्चा भी करा रहे हैं । कोरोनाकाल में उन्होंने परिचर्चा के ऑनलाइन कई कार्यक्रम भी किए थे।
आर्य समाज, बिहारीपुर व अनाथालय बरेली के भूतपूर्व मंत्री, वैदिक प्रवक्ता, भारत सरकार के हिन्दी सलाहकार समिति के पूर्व सदस्य रहे डॉ श्वेतकेतु शर्मा ने बरेली के आर्य समाज पर कई जानकारी दीं। उनके अनुसार बरेली में आर्य समाज का उद्भव 1879 के आसपास ही हुआ। बरेली में आर्य समाज के बारे में वह बताते हुए महर्षि अरविंद घोष का उल्लेख कर कहते हैं कि एक स्थान पर महर्षि अरविंद घोष ने लिखा था कि ‘जिस प्रकार संसार की चोटियों में सर्वोच्च चोटी हिमालय है, उसी प्रकार इस युग में ऋषि, महर्षि, महात्मा, संन्यासियों व युग निर्माताओं में महा युगनिर्माता महर्षि स्वामी दयानंद सरस्वती हिमाचल की सर्वोच्च चोटी के समान थे’। अमर हुतात्मा स्वामी श्रद्धानंद सरस्वती ने श्रद्धांजलि स्वरूप 1925 में मथुरा में महर्षि दयानंद सरस्वती की जन्म शताब्दी पर यह विचार व्यक्त किये थे। ऋषि वर् ! तुम्हें वर्ष 1925 में भौतिक शरीर त्यागे हुए अब लगभग 96 वर्ष हो चुके हैं, जिसमें तुम्हारी दिव्य मूर्ति ( जिसके प्रथम व अन्तिम दर्शन मेने बरेली में अगस्त 1879 में किये थे, मेरे ह्दय तट पर अब तक ज्यों के त्यों अंकित हैं । मेरे निर्मल ह्दय के अतिरिक्त कौन मरणधर्मा मनुष्य जान सकता है कि कितनी बार गिरते- गिरते तुम्हारे स्मरण मात्र से मेरी आत्मिक रक्षा हुई है । तुमने कितनी बार गिरी हुई आत्माओं की कायापलट की, इसकी गणना कौन मनुष्य कर सकता है, परमात्मा के सिवाय, जिसकी पवित्र गोद में तुम इस समय विचर रहे हो । कौन कह सकता है कि तुम्हारे उपदेशों से निकली हुई अग्नि ने संसार में प्रचलित कितने पापों को दग्ध कर दिया है ? परन्तु अपने विषय में, मै यह कह सकता हूं कि तुम्हारे साथ कुछ समय के वास ने मुझे कैसी गिरी हुई अवस्था से उठाकर सच्चा जीवन लाभ पाने के योग्य बनाया । सच बात तो यह है कि भारत देश व विश्व को हिमाचल की चोटी के समान श्रद्धानंद जैसे निर्भीक, निडर और अडिग संन्यासी देने का गौरव यदि किसी नगर को जाता है तो वह है बरेली। जिस विभूति को यह श्रैय दिया जा सकता है तो वह एक मात्र ऋषिवर् महर्षि दयानंद सरस्वती।

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     ऐसे महानतम व्यक्तित्व स्वामी दयानंद सरस्वती का पदार्पण बरेली में तीन बार हुआ। प्रथम बार शाहजहांपुर से मुरादाबाद जाते हुये मार्गशीष कृष्ण 5 संवत 1933 वि तदनुसार वह 6 नवम्बर 1876 बरेली प्रथम बार आये थे और दो सप्ताह तक रुके थे । इसके बाद दूसरी बार महर्षि दयानंद का मुरादाबाद से वापस कर्णवास जाते समय 29 नवम्बर 1876 ई को बरेली आगमन हुआ था। एक दिन खजांची लक्ष्मी नारायण के यहां रात्रि विश्राम के बाद सबेरे ही कर्णवास को प्रस्थान किया था।अन्तिम बार बदायूं से 14 अगस्त 1879 को तीसरी बार बरेली आये और तीन सप्ताह 4 सितम्बर 1879 तक रहे थे। अपने  इस अन्तिम प्रवास में स्वामी दयानंद सरस्वती नित्य सार्वजनिक प्रवचन एवम शंका समाधान किया। बरेली में पादरी डा. टी. जे. स्काट से दयानंद सरस्वती जी के तीन लिखित शास्त्रार्थ हुये। गिरजाघर में पादरी डा. टी. जे. स्काट के अनुरोध पर उपदेश दिया। स्वलिखित आत्मवृत्त प्रथम किस्त थियोसोफिस्ट को प्रकाशन को भेजा था। भरी सभा में सिहं गर्जना की  कि कुछ लोग कहते हैं सत्य को प्रकट मत करो, कलैक्टर क्रोधित होगा, कमिश्नर अप्रसंन्न होगा, गवर्नर पीडा देगा, अरे चक्रवर्ती राजा भी क्यों न हो, हम तो हमेशा सत्य ही कहेंगे । घोर नास्तिक मुन्शीराम के जीवन में आस्तिकता का  बीजारोपण कर जाना, जिससे नया इतिहास भारत भूमि पर रच गया।
   महर्षि दयानंद के तीसरे प्रवास 25, 26, 27 अगस्त 1879 को फादर टी जे स्काट से बरेली में मोती पार्क कुतबखाने पर तीन विषयों जिसमें, पुनर्जन्म, ईश्वरावतार, मनुष्य के पाप बिना फल भुगते क्षमा किये जाते हैं या नहीं ? पर लंबा शास्त्रार्थ हुआ था ।
उस समय ऋषि दयानंद ने देखा था कि अन्धविश्वास, कुरीतियां चरमसीमा पर थीं। आठ आठ आने में निर्धन, असहाय, असमर्थ अनाथ बच्चों को बेच जाते थे तो स्वामी जी का ह्दय उससे अत्यधिक द्रवित हुआ । बरेली में सबजी मन्डी के अन्दर एक चर्च था जो एक अन्धविश्वास व कुरीतियों को पसोरते हुये एक अनाथालय के रूप में भी कार्य करता था जहां हिन्दू व मुसलमान दोनो ही अपने अनाथ निर्धन बच्चों को छोड़ देते थे या बेच देते थे।
       डॉ श्वेतकेतु शर्मा बताते हैं कि ऋषि दयानंद सरस्वती की करूणामयी भावना से यह देखा न गया और अपने निकटतम खजांची लक्ष्मी नारायण रईस व कुछ प्रबुद्ध जनों को प्रेरणा देकर आर्य समाज बिहारीपुर गली आर्य समाज की स्थापना 1883 व वर्ष 140 विक्रम सन् 1883 को आर्य समाज अनाथालय की बरेली में स्थापना की गई, जो वर्तमान में आर्यसमाज बिहारीपुर कुतबखाने के समीप गली में स्थित है। उसे आर्य समाज गली, महर्षि स्वामी दयानंद सरस्वती चौक के नाम से जाना जाता है। बरेली में आर्य समाज अनाथालय की भी स्थापना की गई थी। अब सी आई ई पं हेतराम द्वारा दी गई जमीन पर यह आर्य समाज अनाथालय स्थित है ।
ऋषि दयानंद के बरेली प्रवास में लाला लक्ष्मी नरायण खजांची  व मुन्शी राम (बाद में स्वामी श्रद्धानन्द ) के अतरिक्त विद्या राम जायसवाल, ठाकुर दास वैश्य, पं हेत राम, बांके बिहारी लाल, पं मथुरा प्रसाद रईस, बाबू बल्देव प्रसाद वकील, पं गंगा राम आदि विशेष रूप से प्रभावित हुये। उन्होंने ही बरेली में आर्य समाज का अद्भुत अद्वितीय कार्य किया ।
   बाबू बल्देव प्रसाद दो बार अखिल भारतीय कायस्थ सभा के सभापति भी रहे तथा 1893 ई में आपने आर्य समाज हाईस्कूल व आर्य कन्या पाठशाला भूड़ स्थापित की थी। यह स्कूल 1911 में किन्हीं कारणों से बन्द हो गया था परन्तु कन्या पाठशाला को लालता प्रसाद जी व मुकुट बिहारी लाल, मोहल्ला भूड पर ले आये थे जो आर्य समाज भूड के प्रबन्धन में आज कन्या डिग्री कालेज है । वर्ष 1902 ई में आर्य समाज भूड की स्थापना हुई थी जिसका गौरवशाली इतिहास है । इसके बाद पिछले 145 वर्ष के इतिहास में बरेली शहर के अतिरिक्त तहसीलों व ग्रामीण क्षेत्रों में अनेक आर्य समाज की स्थापना हो चुकी है जिनमें शहरी क्षेत्र में आर्य समाज कैन्ट, आर्य समाज सुभाष नगर, आर्य समाज माडल टाउन , आर्य समाज जगतपुर, आर्य समाज नगरिया परिक्षित, आर्य समाज बिहारीपुर, आर्य समाज भूड़, आर्य स्त्री समाज बिहारीपुर आदि हैं। तहसील स्तर पर नवाब गंज, आंवला, बहेड़ी, मीरगंज, फरीदपुर में आर्य समाज स्थापित होने के साथ इन तहसीलों के ग्रामीण अंचलों में भी सैकड़ो आर्य समाज की स्थापना हो चुकी है। जो आज भी वैदिक सिद्धांतों के प्रचार प्रसार के लिये गतिशील है। यह सभी बरेली की आर्य समाजों को संरक्षण, संचालन व गतिशील बनाने के लिये उत्तर प्रदेश की सर्वोच्च संस्था आर्य प्रतिनिधि सभा,  उ प्र , लखनऊ से मान्यता प्राप्त भी हैं।


       डॉ श्वेतकेतु शर्मा बताते हैं कि बरेली में आर्य समाज की कई शिक्षण संस्थायें भी कार्यशील हैं, आर्य समाज बिहारीपुर के अधीन आर्य समाज अनाथालय महिला अनाथालय सिविल लाइन, आर्य समाज भूड के अधीन आर्य कन्या भूड डिग्री कालेज, भूड, महावीर प्रसाद आर्य कन्या इन्टर कालेज भूड, आर्य समाज भूड संस्कृत पाठशाला (जो वर्षो तक चली बाद में बन्द हो गई, इस संस्कृत पाठशाला में सैकडों छात्रों ने स्नातक उपाधी ग्रहण करके राष्ट्रीय स्तर पर काम किया ), आर्य समाज जगतपुर के अधीन दयानंद बाल विद्या मन्दिर, आर्य समाज सुभाष नगर के अधीन आर्य पुत्री इन्टर कालेज, विद्यार्य सभा के अधीन ( एस बी इन्टर कालेज, स्त्री सुधार आर्य कन्या इन्टर कालेज, गांधी हायर सेकेंड्री स्कूल, कलक्टर बक गंज इन्टर कालेज , आर्य समाज माडल टाउन के अधीन दयानंद बाल विद्या मन्दिर  संचालित हो रहे हैं।
डी- ए- बी इन्टर कालेज, बरेली (यह आर्य समाज अनाथालय प्रांगण में स्थित है जो अनाथालय की प्रबंध समिति द्वारा स्थापित किया गया था। बाद में स्वतन्त्र कमेटी में परिवर्तित हो गया। आज हाईस्कूल तक रह गया, आर्य समाज अनाथालय से लीज पर भूमि लेकर बनाया गया था )।
इसके अतिरिक्त प्रत्येक तहसील की आर्य समाज व ग्रामीण अंचल के आर्य समाज के द्वारा भी अनेक दयानंद बाल विद्या मन्दिर संचालित हो रहे हैं ।
    महर्षि दयानंद सरस्वती की बरेली में वैदिक गूंज के बाद 145 वर्ष के इतिहास में आर्य विद्वानों, विदुषियों, और वेदाचार्यो की एक लम्बी श्रृंखला है, जो बरेली नगर निरंतर आर्य जगत को देखता चला आ रहा है। महर्षि दयानंद सरस्वती के चरण इस बरेली धरती पर ऐसे पड़े कि उनके तप और त्याग के फल स्वरूप बरेली की यह धरती धन्य हो गई।
बरेली की आर्य विभूतियां
युग निर्माता महर्षि दयानंद सरस्वती को कोटिशः नमन जिनके द्वारा वेद की ज्योति के प्रज्वलित होते ही लाखों की संख्या में विश्व स्तर पर महापुरुषों का उदय होने लगा दयानंद का *वाक्य वेदों की ओर लौटें की उद्धोषणा के बाद
जो सामाजिक पारिवारिक व राष्ट्रीय रूप से जो क्रांति आई  जिससे आर्योदय की परिकल्पना साकार होती दीखने लगी । सैकडों की संख्या में विद्वान विदुषियों का बनना प्रारम्भ हो गया, जिसके ज्ञान से भा प्रभा यस्यां रतं भारतम् का यशोगान सर्वत्र फैलने लगा।
  आर्योदय की ज्योति प्रकाशमान होते ही ऋषि दयानंद के बाद विद्वान व विदुषियों का युग पुनः प्रारम्भ हो गया था । डॉ श्वेतकेतु शर्मा के अनुसार बरेली की पावन भूमि पर ऋषि दयानंद के पदार्पण व उनकी प्रेरणा से समाज की विभिन्न विसंगतियों अन्धविश्वास, कुरीतियों को दूर करने के लिये वैदिक ज्ञान, विज्ञान व वैदिक विचारधारा से ओतप्रोत  विद्वानों व विदुषियों का क्रम तेज गति से बढ़ने लगा जिसे बरेली की पावन भूमि से देश विदेश में वेद की ज्योति शिखा सर्वत्र फैलने लगी । जिसमें बरेली की निम्न विभूतियों ने राष्ट्रीय व अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर बरेली को गौरवान्वित किया जिसमे पंडित बिहारी लाल शास्त्री, आचार्य विश्वश्रवा व्यास, वेद भारती, डा. सावित्री देवी शर्मा वेदाचार्या, डा. विशुद्धा नन्द मिश्र, आचार्य रमेश चन्द्र पाठक, स्वामी इन्द्र देव यती, स्वामी गोपाल सरस्वती, डा. संतोष कण्व, मुरली धर, डा. मृदुला शर्मा, डॉ महाश्वेता चतुर्वेदी, डॉ सुरेन्द्र शर्मा आदि रहे।
    — निर्भय सक्सेना, पत्रकार

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