मुख्य समाचार पर जाएँ
Wednesday, 28 October 2026
SKS24NEWSNational Hindi Digital News Networkख़बर वही, जो सच बताए!
देश की आवाज़स्थानीय खबरें · राजनीति · शिक्षा · खेल
⛅ 25.5 °C बादल · बदायूँ
🥇 सोना ₹1,46,220.00 / 10 ग्राम
🥈 चांदी ₹2,20000/ किलो
सुर्खियाँ
Uttar Pradesh

श्रद्धा उत्साह एवं प्यार से मनाया धंनु गुरू रामदास जी का पावन प्रकाश पर्व

October 28, 2026By admin0 comments
👁 6.4K views
WhatsAppImage2026-02-15at42216PM1
previous arrow
next arrow

बरेली की गुरू नानक नाम लेवा सिक्ख संगत ने गुरुद्वारा ग्रीन पार्क में गुरू रामदास जी का पावन प्रकाश पर्व श्रद्धा उत्साह एवं प्यार से मनाया गया। बड़े पंडाल में कार्यक्रम की शुरुआत साहिब श्री गुरू ग्रंथ साहिब को विशेष रूप से तैयार तख्त पर विराजमान कर
सोदर रहिरास का पाठ हेड ग्रंथी ज्ञानी सुरजीत सिंघ ने किया आरती शबद चौकी रागी जसविंदर सिंघ ने गायन किया।
गुरुद्वारा सीस गंज साहिब (दिल्ली) से विशेष तौर से ज्ञानी हरनाम सिंघ जी ने गुरू इतिहास बताते हुए कहा कि
सिक्ख धर्म के चौथे गुरू, गुरू रामदास जी का जीवन विनम्र, सेवा, भक्ति एवं बेमिसाल गुरू भक्ति का प्रतीक है। गुरू रामदास जी का जन्म 24 सितंबर 1534 को लाहौर (अब पाकिस्तान) के चूना मंडी में पिता हरिदास एवं माता दया कौर के घर में हुआ। उनका बचपन का नाम भाई जेठा जी था। बचपन में ही माता पिता के निधन के कारण आप जी का पालन पोषण ननिहाल बासरके गाँव (पंजाब) में हुआ, गरीबी होने के कारण आप मेहनत करके घुंगनियां बेचकर घर का खर्च एवं जरूरतमंद लोगों की सेवा करते थे। भाई जेठा जी तीसरे गुरू, गुरू अमरदास जी की शरण में आए और अपना पूरा जीवन गुरू घर की सेवा में समर्पित कर दिया। गुरू अमरदास जी के हुकुम से आपने बाउली साहिब का कार्य स्वयं सेवा करके निभाया। आप की कड़ी मेहनत एवं लग्न देखकर गुरू अमरदास जी ने अपनी पुत्री बीबी भानी का विवाह भाई जेठा जी से कर दिया। गुरू रामदास जी के तीन पुत्र -श्री प्रिर्थीचंद, महादेव एवं श्री गुरू अर्जुन देव जी थे। सेवा भक्ति, आज्ञापालक अडोल श्रद्धा भावना के धनी होने के कारण गुरू अमरदास जी ने 1574 में गोइंदवाल में सिक्ख पंथ के चौथे गुरू के रूप में गुरता गद्दी प्रदान की। एवं आपका नाम भी गुरू रामदास रख दिया।
गुरता गद्दी मिलने के पश्चात आप ने
चक रामदास नगर बसाया जिसे श्री अमृतसर साहिब के नाम से दुनिया जानती है। गुरू जी ने संतोखसर सरोवर एवं अमृतसर सरोवर की खुदाई का कार्य भी आरम्भ करवाया जिससे इस स्थान ने सिक्ख धर्म के आध्यात्मिक विकास एवं व्यापारिक केंद्र का स्थान हासिल किया। गुरू रामदास जी की पवित्र बाणी श्री गुरू ग्रंथ साहिब में 30 रागों में सुशोभित है। जिसमें छंद एवं वारों की रचना शामिल है। विवाह के समय पढ़ी जाने वाली प्रसिद्ध बाणी “लावां” (सूही राग) आप की अनमोल देन है।

ReferralCodeLLVR11
previous arrow
next arrow
WhatsAppImage2023-12-28at122820
previous arrow
next arrow
WhatsAppImage2024-06-13at122213
previous arrow
next arrow

समाज एवं सिक्ख पंथ की सेवा निभाते हुए आप जी 1 सितंबर 1581 में गोइंदवाल साहिब में ज्योति समाये। जोति ज्योति समाने से पूर्व अपने उत्तराधिकारी के रूप में अपने छोटे पुत्र गुरू अर्जुन देव के रूप में गुरता गद्दी प्रदान कर चौथे गुरू के रूप में स्थापित किया।
पंथ- प्रसिद्ध कीर्तनिये भाई अनन्त वीर सिंघ LA(USA) जब स्टेज पर आये पूरा दीवान हाल संगत से भर गया था।

उन्होंने मर्यादित राग से कीर्तन की आरम्भता की
गुरबाणी कीर्तन कर संगत को निहाल किया।
उनके द्वारा गायन किया शबद
“धनु धनु रामदास गुरु जिनि सीरिआ तिनै सवारिआ”
गायन किया सारी संगत पंडाल में गायन कर रही थी।

संगत को शहर के सभी गुरुद्वारों से ले-जाने हेतु बसों का इंतज़ाम किया गया था । नवाबगंज, भुता, फरीदपुर से भी बसों का इंतज़ाम किया गया था।
गुरू का लंगर अटूट सारी संगत ने छका दीवान की समाप्ति अरदास हुकुमनामा
के पश्चात गुरू ग्रंथ साहिब को जयकारों की गूँज में निज स्थान पर स्थापित किया गया। सभी सेवदारों को गुरू बखशीष सिरोपा एवं मोमेंटो प्रदान किये गए । तत पश्चात् शानदार अतिशबाज़ी की गयी।
संचालन जसवंत सिंघ एवं मालिक सिंघ कालड़ा ने किया। सोबती परिवार एवं अध्यक्ष कर्नल गुरदीप सिंघ
ने सरबत संगत का धन्यवाद किया। इस अवसर पर विशेष सहयोग राजेंद्र सिंघ, मनु बख्शी, इंदरजीत सिंघ, सुरजीत सिंघ, जसवीर सिंघ, गुरदयाल सिंघ, परमजीत सिंघ, बिर्जेदर सिंघ, कुलदीप सिंघ, गौरव भाटिया, सुखदेव सिंघ, हरलीन सिंघ, लखविंदर सिंघ, हरिओम सरपाल, मनमीत सिंघ, गिल, जितेंदर सिंघ, निशान सिंघ हर्मिंदर सिंघ आदि का रहा।

WhatsAppImage2024-10-20at41111PM1
previous arrow
next arrow
WhatsAppImage2023-04-17at53854PM4
previous arrow
next arrow

यह भी पढ़ें

Home
Live TV
VIDEO NEWS
+ Create
Verified by MonsterInsights