बरेली। मजहब भले ही अलग-अलग हों, लेकिन हुनर और इंसानियत की कोई सरहद नहीं होती। बरेली की मलूकपुर स्थित ‘रावण वाली गली’ इस बात की अनूठी मिसाल पेश कर रही है। यहां करीब 200 साल से चली आ रही परंपरा के तहत कारीगर दशहरे के लिए रावण, कुंभकरण और मेघनाथ के पुतले तैयार करते आ रहे हैं। इस पुश्तैनी काम में हिंदू और मुस्लिम कारीगरों की साझा मेहनत आपसी भाईचारे और गंगा-जमुनी तहजीब की खूबसूरत तस्वीर पेश करती है। किला क्षेत्र के फूटा दरवाजा और आसपास की गलियों में भी यह परंपरा देखने को मिलती है, जहां दशहरे के पुतलों के साथ मोहर्रम के ताजिये भी तैयार किए जाते हैं। त्योहार अलग हैं, लेकिन इन्हें आकार देने वाले हाथों का हुनर एक है।
मलूकपुर की रावण वाली गली में पीढ़ियों से परिवार इस कला को संजोए हुए हैं। कारीगर बांस, कागज और अन्य सामग्री की मदद से रावण, कुंभकरण और मेघनाथ के विशाल पुतलों को तैयार करते हैं। वहीं, किला क्षेत्र के फूटा दरवाजा में भी पुतले और ताजिये बनाने का काम साझा सांस्कृतिक विरासत को जीवंत बनाए हुए है। हिंदू कारीगर वीरेंद्र कुमार चंद्रा और कल्लू रावण वाले का परिवार भी इस परंपरा को आगे बढ़ाने में जुटा है। इन कारीगरों की मेहनत बताती है कि कला और रोजगार के रिश्ते मजहबी सीमाओं से कहीं ऊपर हैं।
हालांकि, बदलते वक्त के साथ इस पुश्तैनी कारोबार की मुश्किलें भी बढ़ती जा रही हैं। कारीगरों के मुताबिक, बांस की कीमत में लगातार बढ़ोतरी हुई है। पहले बांस का एक बंडल करीब 250 रुपये में मिलता था, जो अब लगभग 450 रुपये का हो गया है। एक पुतले को तैयार करने में तीन मजदूरों को चार से पांच दिन तक मेहनत करनी पड़ती है। सामग्री और मजदूरी मिलाकर एक पुतले की लागत करीब 10 से 11 हजार रुपये तक पहुंच जाती है। बढ़ती लागत के कारण अब 30 से 40 फीट ऊंचे पुतलों के बजाय करीब 20 फीट के पुतलों के ऑर्डर अधिक मिल रहे हैं।
कारीगरों के सामने सबसे बड़ी चुनौती इस हुनर को अगली पीढ़ी तक पहुंचाने और परिवार की आजीविका चलाने की है। पहले करीब 20 युवक पुतले बनाने के काम में जुटे रहते थे, लेकिन अब इनकी संख्या घटकर लगभग 10 रह गई है। दशहरे का सीजन समाप्त होने के बाद कई कारीगरों को दूसरे कामों का सहारा लेना पड़ता है। कुछ ई-रिक्शा चलाकर तो कुछ शादी समारोहों में सजावट का काम करके परिवार का खर्च चलाते हैं। ऐसे में बरेली की यह करीब दो सौ साल पुरानी परंपरा न केवल सांप्रदायिक सौहार्द की मिसाल है, बल्कि उन मेहनतकश हाथों की कहानी भी है, जो आर्थिक चुनौतियों के बीच अपनी कला और साझा विरासत को बचाए रखने की कोशिश कर रहे हैं।
बरेली की ‘रावण वाली गली’ में 200 साल से कायम है पुतले बनाने की परंपरा

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