बरेली। दूरदर्शन केंद्र के पास स्थित शांतिकुंज पब्लिक गर्ल्स इंटर कॉलेज में आयोजित रासलीला के तीसरे दिन श्रीकृष्ण और सुदामा की बाल सखा-मित्रता की अत्यंत भावपूर्ण लीला का मंचन किया गया। आज की लीला का शुभारंभ उज्जैन स्थित महर्षि संदीपनी के आश्रम में श्रीकृष्ण और सुदामा के बचपन की मित्रता के प्रसंग से हुआ। लीला में दिखाया गया कि समय बीतने के साथ श्रीकृष्ण द्वारिका के राजा बनकर द्वारिकाधीश कहलाए, जबकि उनके बाल सखा सुदामा दिन-प्रतिदिन अत्यंत साधारण और निर्धन ब्राह्मण के रूप में जीवन व्यतीत करते रहे।
सुदामा की दयनीय आर्थिक स्थिति को देखते हुए उनकी पत्नी ने उन्हें अपने बाल सखा श्रीकृष्ण से मिलने द्वारिका जाने का आग्रह किया। सुदामा स्वयं संकोच कर रहे थे और अपने मित्र से अपनी स्थिति बताने में झिझक रहे थे। पत्नी के आग्रह पर वे फटे-पुराने वस्त्र और नंगे पैर द्वारिका पहुंचते हैं।द्वारिका के द्वार पर पहुंचकर सुदामा ने द्वारपालों से अपने बाल सखा श्रीकृष्ण से मिलने की इच्छा जताई। काफी आग्रह के बाद जब द्वारपालों ने द्वारिकाधीश को यह सूचना दी कि उनके बचपन के मित्र सुदामा उनसे मिलने आए हैं, तो श्रीकृष्ण अपने मित्र से मिलने के लिए नंगे पैर ही दौड़ पड़े। उन्होंने सुदामा को गले से लगा लिया और उन्हें राजमहल में सम्मानपूर्वक ले जाकर अपने राजसिंहासन पर बैठाया। श्रीकृष्ण ने स्वयं सुदामा के चरण अपने आंसुओं से धोए, जबकि रुक्मणी ने उन्हें पंखा झुलाया। इस दृश्य ने उपस्थित दर्शकों को भावविभोर कर दिया।
सुदामा संकोचवश श्रीकृष्ण से कुछ भी मांगे बिना ही वापस अपने गांव लौट आए। वहां पहुंचकर उन्होंने देखा कि उनकी पुरानी और टूटी-फूटी झोपड़ी के स्थान पर एक भव्य स्वर्ण महल खड़ा है और उनका परिवार भी खुशहाल जीवन व्यतीत कर रहा है। तब सुदामा समझ गए कि यह सब उनके बाल सखा द्वारिकाधीश श्रीकृष्ण की कृपा का परिणाम है। इस प्रसंग ने उन्हें अपने मित्र के प्रति भावविह्वल कर दिया।
इस प्रसंग का भाव अत्यंत मार्मिक रूप से इस पंक्ति में व्यक्त हुआ—
“किस तरह यारी निभाते-निभाते कान्हा, खुद को सुदामा का कर्जदार बना गए।”
आशुतोष दास जी महाराज ने आज की संदेशप्रद लीला पर कहा कि बच्चों ने इस प्रसंग के माध्यम से यह अनुभव किया होगा कि सच्चा मित्र वही होता है, जो अपने मित्र के मन की पीड़ा और उसके अभाव को बिना कहे ही समझ ले। सच्ची मित्रता धन, पद और सामाजिक स्थिति से परे होती है तथा निःस्वार्थ प्रेम, समानता और समर्पण पर आधारित होती है।
विद्यालय प्रबंधक सुनील कुमार शर्मा ने अपने उद्बोधन में कहा कि रासलीला के आयोजन का उद्देश्य विद्यार्थियों में नैतिक एवं आध्यात्मिक गुणों का विकास करना तथा उन्हें अपनी सांस्कृतिक धरोहर से जोड़े रखना है। भगवान श्रीकृष्ण की लीलाएं विद्यार्थियों को ईश्वर के प्रति निःस्वार्थ प्रेम, समानता और भक्ति की प्रेरणा देती हैं। साथ ही, ये लीलाएं अहंकार को कम कर विनम्र एवं क्षमाशील बनने तथा सच्ची मित्रता, मित्र के प्रति समानता और समर्पण का भाव बनाए रखने की सीख भी देती हैं।
प्रधानाचार्य राधिका चंद ने श्रीवृंदावन धाम से पधारे कलाकारों का आभार व्यक्त किया और उनके उत्कृष्ट मंचन की सराहना की।
आज के आयोजन में आशुतोष शर्मा, महेश हरियाणा, प्रमोद कुमार, धर्मेंद्र पटेल, रेनू यादव, जानकी विष्ट, बबिता, प्राची त्यागी, पुष्पांजलि, प्रियंका यादव, शिवांगी सक्सेना, देवदत्त गंगवार, साक्षी गोस्वामी, दीक्षा साख्यधर, रंजीत गोस्वामी, आरती चौहान, इशिका, अवधेश सिंह, श्रेया सिंह, केतकी शर्मा, लता वर्मा, स्वाति सिंह, अजय कुमार, सौम्य शर्मा, बसंत विष्ट, रूपेश कुमार आदि का विशेष योगदान रहा।
श्रीकृष्ण-सुदामा मित्रता की भावपूर्ण लीलाद्वारिकाधीश ने नंगे पैर दौड़कर सुदामा को लगाया गले

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