लखनऊ। उत्तर प्रदेश में त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव को लेकर असमंजस की स्थिति गहराती जा रही है। इलाहाबाद हाईकोर्ट के तीन महीने के भीतर पंचायत चुनाव कराने के आदेश के बावजूद निर्धारित समयसीमा में चुनाव कराना सरकार और राज्य निर्वाचन आयोग के लिए बड़ी चुनौती बनता नजर आ रहा है। पंचायत चुनाव में अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) का आरक्षण तय करने के लिए गठित समर्पित पिछड़ा वर्ग आयोग की रिपोर्ट में देरी की संभावना ने चुनावी तैयारियों पर सवाल खड़े कर दिए हैं। आयोग को 20 नवंबर तक अपनी रिपोर्ट सौंपनी थी, लेकिन प्रदेश के 75 जिलों में से अब तक केवल 50 जिलों का ही सर्वे और भ्रमण पूरा हो पाया है। शेष 25 जिलों में सर्वे और संबंधित प्रक्रियाएं पूरी होनी बाकी हैं। ऐसे में निर्धारित समयसीमा तक रिपोर्ट तैयार होना मुश्किल माना जा रहा है। सूत्रों के मुताबिक आयोग तीन महीने का अतिरिक्त समय मांगने की तैयारी में है। यदि ऐसा होता है तो रिपोर्ट 31 दिसंबर से पहले आने की संभावना कम हो जाएगी। रिपोर्ट में देरी का असर पंचायत चुनाव की आरक्षण प्रक्रिया और आगे की तैयारियों पर पड़ सकता है। गौरतलब है कि पंचायत चुनाव में ओबीसी आरक्षण निर्धारित करने के लिए पिछड़ा वर्ग आयोग का गठन किया गया है। आरक्षण तय करने के लिए समर्पित आयोग की रिपोर्ट महत्वपूर्ण होती है। इसके आधार पर सरकार को आरक्षण संबंधी प्रक्रिया आगे बढ़ानी होती है। हालांकि, हाईकोर्ट ने तीन महीने के भीतर पंचायत चुनाव कराने का निर्देश देते हुए मौजूदा आरक्षण व्यवस्था के तहत चुनाव कराने की बात भी कही है। ऐसे में आयोग की रिपोर्ट में देरी और अदालत के आदेश के बीच सरकार के सामने कानूनी एवं प्रशासनिक चुनौती खड़ी हो सकती है। पंचायत चुनाव में संभावित देरी का राजनीतिक असर भी दूरगामी हो सकता है। वर्ष 2027 में उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव प्रस्तावित हैं। ऐसे में पंचायत चुनाव को विधानसभा चुनाव से पहले ग्रामीण क्षेत्रों में राजनीतिक ताकत परखने के बड़े अवसर के रूप में देखा जा रहा है। ग्राम प्रधान, क्षेत्र पंचायत सदस्य और जिला पंचायत सदस्यों के चुनाव के जरिए राजनीतिक दलों को ग्रामीण मतदाताओं के रुझान, संगठन की सक्रियता और स्थानीय नेतृत्व की लोकप्रियता का अंदाजा मिलता है। यदि पंचायत चुनाव की प्रक्रिया 2027 तक खिंचती है तो विधानसभा चुनाव की तैयारियों के साथ दोनों चुनावों का राजनीतिक दबाव बढ़ सकता है। इससे भाजपा, सपा, बसपा और कांग्रेस सहित सभी प्रमुख राजनीतिक दलों की रणनीतियां प्रभावित हो सकती हैं। पंचायत चुनाव में जीत और हार का असर विधानसभा चुनाव से पहले राजनीतिक माहौल बनाने में भी महत्वपूर्ण माना जाता है। फिलहाल निगाहें पिछड़ा वर्ग आयोग की रिपोर्ट, सरकार के अगले कदम और हाईकोर्ट के आदेश के अनुपालन पर टिकी हैं। सबसे बड़ा सवाल यही है कि उत्तर प्रदेश में पंचायत चुनाव निर्धारित समयसीमा में हो पाएंगे या ओबीसी आरक्षण की प्रक्रिया में देरी के चलते चुनावी कार्यक्रम आगे खिसक सकता है।
यूपी पंचायत चुनाव पर फिर मंडराया देरी का संकट, 2027 विधानसभा चुनाव से पहले बढ़ेगी सियासी हलचल

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