बदायूँ। श्री संतमत सत्संग मंदिर के प्रांगण में आयोजित दिव्य आध्यात्मिक संतमत सत्संग एवं ज्ञान यज्ञ वर्षा कार्यक्रम में हरिद्वार से पधारे पूज्य स्वामी सुबोधानन्द बाबा जी महाराज ने सत्संग के दूसरे एवं तीसरे सत्र में श्रद्धालुओं को गुरु नाम की महिमा, भक्ति, ध्यान तथा पाप-पुण्य के कर्मफल का आध्यात्मिक महत्व समझाया। उन्होंने सरल एवं सहज भाषा में कहा कि गुरु की प्राप्ति और आत्मज्ञान के लिए मनुष्य को अपने अंतर्मन में विद्यमान दिव्य ज्योति को जाग्रत करना होगा। इसके लिए संतों का सानिध्य और नियमित सत्संग आवश्यक है। स्वामी सुबोधानन्द बाबा जी ने कहा कि मनुष्य का शरीर नश्वर है और संसार में रहते हुए उससे विभिन्न प्रकार के कर्म होते रहते हैं। प्रत्येक कर्म का अपना फल होता है। इसलिए जीवन में स्नान, दान और ध्यान का विशेष महत्व है। उन्होंने कहा कि सौ काम छोड़कर स्नान, एक लाख काम छोड़कर दान और करोड़ों काम छोड़कर ध्यान करना चाहिए। स्नान से शरीर की, जबकि ध्यान से अंतरात्मा की शुद्धि होती है। ध्यान के माध्यम से मनुष्य अपने भीतर की आध्यात्मिक चेतना को जाग्रत कर सकता है। उन्होंने गुरु के प्रति अटूट श्रद्धा और विश्वास रखने का संदेश देते हुए कहा कि संसार रूपी भवसागर से पार उतरने के लिए मनुष्य को अपने गुरु पर पूर्ण विश्वास करना चाहिए। जिस प्रकार एक नाव में बैठकर ही नदी पार की जा सकती है, उसी प्रकार आध्यात्मिक मुक्ति के लिए गुरु के प्रति एकनिष्ठ समर्पण आवश्यक है। अनेक मार्गों और विचारों में भटकने के बजाय गुरु के बताए मार्ग पर चलना चाहिए। सत्संग के उपरांत दो आध्यात्मिक आरतियां की गईं और श्रद्धालुओं को प्रसाद वितरित किया गया। मंदिर परिसर में परम पूज्य दादा गुरु महर्षि मेहीं परमहंस जी महाराज द्वारा रचित गुरु ग्रंथ, महर्षि मेहीं पदावली सहित अनेक आध्यात्मिक ग्रंथों का स्टॉल भी लगाया गया है, जहां श्रद्धालु धार्मिक साहित्य प्राप्त कर रहे हैं। कार्यक्रम के अंतर्गत सत्संग के उपरांत सुबह 11 बजे स्वामी सुबोधानन्द बाबा जी महाराज द्वारा गुरु दीक्षा का कार्यक्रम आयोजित किया गया, जिसमें कई श्रद्धालुओं ने गुरु दीक्षा ग्रहण कर आध्यात्मिक मार्ग पर चलने का संकल्प लिया।
संतमत सत्संग में गुरु नाम की महिमा का किया गुणगान, कई श्रद्धालुओं ने ग्रहण की गुरु दीक्षा

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